Wednesday, October 19, 2022

माँ के गर्व में शिशु क्या सोचता है

माँ के गर्व में शिशु क्या सोचता है

माँ के गर्व में शिशु क्या सोचता है
 दोस्तो कुछ ऐसा कि हम सभी जानते हैं कि इंसान जन्म लेने से पहले 9 महीने अपनी मां के गर्भ में समय व्यतीत करता है।ओर बच्चा जब मां के गर्भ में पहली बार आता है। तो मैं उस बच्चे की इस मृत्यु लोक में आने से पहले ही कई सपने बुनने लगती है। लेकिन क्या आप जानते हैं। कि बच्चा अपनी मां के गर्भ में क्या सोचता है। और उसे गर्भ में क्या सजा भोगनी पड़ती है। 

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नही जानते है। तो इस पोस्ट को अंत तक जरूर देखें क्योंकि गरुड़ पुराण में जीवन मृत्यु स्वर्ग नरक पाप पुण्य मोक्ष पाने के उपाय आदि के साथ यह भी बताया गया है। कि शिशु को माता के गर्भ में क्या-क्या कष्ट भोगने पड़ते हैं। और बच्चा किस प्रकार भगवान का स्मरण करता है। शिशु मां के गर्भ में क्या महसूस करता है। उस समय उसकी मन एवं मस्तिष्क में क्या-क्या बातें चलती है।

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 नमस्कार दोस्तो आपका स्वागत है। गरुड़ पुराण की धर्म कांड की प्रीत कल्प अध्याय में तो दोस्तो पक्षीराज गरुड़ जब भगवान विष्णु से पूछते हैं। कि हे प्रभु जब कोई आत्मा दूसरा शरीर धारण करने से पहले अपनी मां के गर्भ में होती है। तो वह कैसा महसूस करती है। कृपया मुझे विस्तार से बताइए तो भगवान विष्णु गर्व से कहते हैं।


 हे गरुड़ गर्भस्थ जीव को अपने पूर्व जन्मों का ज्ञान रहता है। अगर वस्तु जीव को अपने पूर्व जन्मों का ज्ञान रहता है।तो स्मरण करता है। की आयु के समाप्त होने पर शरीर का परित्याग करके अब मैं मलारी में रहने वाले छोटे-छोटे क्रीमीय कीटाणुओं की एक विशेष क्यों नहीं छोड़ देते।तो में शिशु का चलने वाली सर्वाधिक योनि में पहुंचा फिर मच्छर हो गया था उसके बाद चार पैरों वाला 


 यह वृषभ नामक पशु बन गया था अथवा जंगली शुक्र की योनि में प्रवेश था इस प्रकार गर्भ में रहते हुए उस जीवात्मा को पूर्ण ज्ञान रहता है। किंतु उत्पन्न होते ही वह तत्काल उसे भूल जाता है। याद आता है कि मैं दूसरे को चलने का विचार करता रहा मैंने शरीर की रक्षा के लिए धर्म का परित्याग करके दूध छल कपट और चोर प्रति का आश्रय लिया फिर घर  को याद आता है।


 कि उसने अपने पिछले जन्म में अत्यंत कष्ट से स्वयं लक्ष्मी को एकत्र किया था तो अभिलाष ईंधन का उपयोग वह नहीं कर सका अतिथि और बंधु बांधव को स्वादिष्ट फल ग्रस्त तथा तांबूल देकर कि मैं उन्हें संतुष्ट करने में असफल रहा बच्ची को याद आता है कि इस पृथ्वी पर स्थित त्रिविक्रम भगवान विष्णु की प्रतिमा का दर्शन तो मैंने किया नहीं उन्हें प्रणाम नहीं किया और ना तो उनकी पूजा की प्रभारी किया और ना तो उनकी पूजा की प्रभास क्षेत्र में विराजमान भगवान सोमनाथ की भक्ति पूर्वक पूजा एवं वंदना भी मेरे द्वारा नहीं हुई है।


 जब ऐसी चिंता गर्भस्थ जीव करता है। तब यमदूत उसे कहते हैं। कि यह देह धारण जैसा तुमने किया है। उसके अनुसार अपना निस्तार करो क्योंकि घर में पल रहा जी विश्वनाथ करता हुआ अपने को कोसते हुए कहता है। कि तुमने अपनी कमाई से जो धन अर्जित किया था उसमें से किसी को दान नहीं दिया पर रहते हुए तुमने भूमि दान गोदान चालान फलदान तांबूल दान अथवा कन्यादान भी नहीं किया भला क्या सोच रहे हो तुम्हारे पिता और माता में मर गए जिसने तुमको अपने गर्भ में धारण किया वह तुम्हारी माता भी मर गई तुम्हारे दोस्तो भी नहीं रहे।


 ऐसा तुमने देखा है तुम्हारा पांच भौतिक शरीर अग्नि में जलकर भस्म हो गया तुम्हारे द्वारा एकत्र किया गया संपूर्ण धन-धान्य पुत्रों ने हस्तगत कर लिया तारा सुभाषित है और क्यों कुछ तुमने धर्म संचय किया है बस तुम्हारे साथ है 3:00 पर जन्म लेने वाला राजा हो अथवा सन्यासी या कोई श्रेष्ठतम ब्राह्मण हो मैं मरने के बाद पुनः आया हुआ नहीं दिखाई देता है। जो भी इस धरती पर उत्पन्न हुआ है।


 उसकी मृत्यु निश्चित है। और इसके बाद वह विलाप करने लगता है और वह भगवान से प्रार्थना करता है कि यही प्रभु जब जन्म के बाद मुझे पुनः मृत्यु को ही प्राप्त होना है तो फिर मेरा जन्म क्यों हो रहा है अगर संभव हो तो मुझे जीवन मृत्यु के चक्र से मुक्त करिए चक्र से मुक्त करिए गरुड़ पुराण के अनुसार फिर माता के गर्भ में पल रहा शिशु भगवान से कहता है कि महेश गर्व से अलग होने की इच्छा नहीं करता कि बाहर जाने से पाप ज्यादा करने पड़ते हैं।


 जिससे नर्क आदि प्राप्त होते हैं इस कारण बड़े दुख से व्याप्त हूं फिर भी दुख रहे तो आपके चरण का आश्रय लेकर मैं आत्मा का संसार से उद्धार कर लूंगा माता की इतनी पूरी 9 महीने शिशु भगवान से प्रार्थना ही करता है। लेकिन यह समय पूरा होते ही जब प्रसूति के समय वायु से तत्काल बाहर निकलता है। तो उसे कुछ याद नहीं रहता साइंस के अनुसार मां के गर्भ से बाहर आने वाली शिशु को काफी पीड़ा का सामना करना पड़ता है। कारण उसकी मस्तिष्क पर काफी जोर पड़ता है। शायद यही कारण है। कि उसे कुछ भी याद नहीं रहता गरुड़ पुराण के अनुसार प्रसूति की हवा से जैसे ही श्वास लेता हुआ शिशु माता के गर्भ से बाहर निकलता है।


 तो उसे किसी बात का ज्ञान भी नहीं रहता गर्व खोकर बहे ज्ञान सहित हो जाता है इसी कारण जन्म के समय वह रोता है इन सबके अलावा गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु ने यह भी बताया है कि जब शिशु गर्भ में 6 मास का हो जाता है तो है भूख प्यास को महसूस करने लगता है कि गर्भ में अपना स्थान बदलने के लायक भी हो जाता है तब है कुछ कष्ट भी भोक्ता है जो भी खाने के रूप में ग्रहण करती है औरत की कोमल त्वचा से होकर गुजरता है। इंटरेस्ट ओं के कारण कई बार शिशु माता के गर्भ में ही बेहोश हो जाता है। सीमास के बाद शिशु का मस्तक नीचे की ओर और पैर ऊपर हो जाते हैं ऐसी स्थिति में वह चाह कर भी इधर उधर ही नहीं हो सकता है।वो खुद को एक पिंजरे में बंद किए पक्षी की तरह महसूस करता है। ऐसे में शिशु ईश्वर की स्तुति करने लगता है। और कहता है कि श्री लक्ष्मीपति जगदा धार संसार को पालने वाले भगवान विष्णु का मै शरणागत करता हु।की भगवान किस योनि से अलग हो तुम्हारे चरणों का स्मरण कर फिर ऐसे उपाय करूंगा जिससे मैं मुक्ति को प्राप्त कर सकूं इसके बाद अपने आसपास गंदगी ठीक है।


 फिर से भगवान से प्रार्थना करता है हे भगवान मुझे कब बाहर निकालो सभी पर दया करने वाली ईश्वर ने मुझे यह ज्ञान दिया है उस ईश्वर की शरण में जाता हूं इसलिए उस ईश्वर की शरण में जाता हूं मेरा जन्म मरण होना उचित नहीं है और अंत में भगवान विष्णु पक्षीराज गरुड़ उसे कहते हैं यही कारण है कि गर्भ में पहुंचकर जो जीवात्मा जैसा चिंतन करता है। शरीर धारी वैसा ही जन्म लेकर बालक युवा पर उपलब्ध होता है। गर्भ में सूची गई बात सांसारिक मोह मोह के कारण विस्मृत हो जाती हैं। तो पुनः मृत्यु काल में उसकी याद आ जाती है यदि शरीर के नष्ट होने पर वह हृदय में ही रह गई है तो पुनः गर्भ में जाने पर उसका स्मरण होना निश्चित है।

ओर दोस्तो कि दर्शकों में देता हूं कि आपको हमारी यह पोस्ट पसंद आई होगी अगर पसंद आई हो तो ज्यादा से ज्यादा लाइक व शेयर करें और अगर आप हमारे website को अभी तक आप सब्सक्राइब नहीं किया है अभी सब्सक्राइब कर ले और हां अगर आप हमारे फेसबुक पर देख रहे हैं इसके लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया अब चलते है।और नई पोस्ट को लेकर आते है।तब तक के लिए

जय हिंद जय भारत

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