Monday, January 2, 2023

एक ऐसा सख्स जो अपने प्यार के खातिर साइकल चला के गया यूरोप

 दोस्तो आज में आपलोगो के लिए लेकर आए हैं। एक लव स्टोरी जी हां एक रियल लव स्टोरी लेकिन अगर आप  सुनते ही इस पोस्ट को चेंज करने की सोच रहे हैं तो सिर्फ कुछ सेकेंड और दे दीजिए यकीन मानिए यह बहुत ही कमाल की है।

भारत का एक ऐसा सख्स जो प्यार के खातिर साइकल चला के गया यूरोप

दोस्तो तो हमारी लव स्टोरी का हीरो कोई आदमी नहीं बल्कि हमारा मुख्य किरदार एक साइकिल है। इसी साइकिल की बदौलत ही प्यारी सी लव स्टोरी मुकम्मल हो पाई है। इनका नाम है।

 प्रदुम कुमार महानंदिया जिनका जन्म सन 1949 में उड़ीसा के बुनकर दलित परिवार में हुआ था।


 दोस्तो जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भारत में दलितों को लेकर स्थिति अब भी पूरी तरह से सुधर नहीं पाई है मगर उस दौरान तो यह मानो किसी उदल की जैसा था सदा बचपन से ही पदुम को कई तरह की यातनाएं और उत्पीड़न झेलने पड़े थे। पूरे स्कूल में बाकी बच्चों से अलग बिठाया जाता इतना ही नहीं समाज के ही कुछ शरारती तत्व उनके घर पर पत्थर फेंका करते मगर अपनी इन परिस्थितियों को प्रद्युम्न एक कभी भी खुद पर हावी नहीं होने दिया 



नई-नई चीजें सीखने और कुछ कर दिखाने का जज्बा उनके अंदर हमेशा से ही था कहते हैं कि बचपन से ही प्रद्युम्न को ललित में काफी दिलचस्पी थी और ललित कला की पढ़ाई करना चाहते थे। मगर पैसों की कमी उनकी राहों में कांटा बन गई जिसकी चलती अच्छे कॉलेज में सिलेक्शन होने के बावजूद एडमिशन नहीं ले पाए भला कहते हैं।


 ना कि अगर किसी चीज को शिद्दत से चाहो तो वह सादा समय तक आ आपसे दूर नहीं रह पाती प्रद्युम्न की काव्य को देखते हुए कोई सा सरकार उनकी मदद के लिए आगे आए और 1971 में उन्हें दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट्स में पढ़ाई करने का मौका मिला हमारे साइकिल मैन की कहानी इतनी सीधी कैसे हो सकती है दिल्ली जाकर भी उनकी दिक्कतें खत्म नहीं हुई कॉलेज में एडमिशन तो मिल गया मगर रहने के लिए घर कहां था ऐसे में उन्हें अक्सर फुटपाथ पर सोना पड़ता और पब्लिक टॉयलेट का इस्तेमाल करना पड़ता 


लेकिन हर कदम पर उनकी कला उनके साथी कॉलेज की बात को शाम को दिल्ली के कनॉट प्लेस पर लोगों के पोस्टर बनाया करते जिससे उन्हें कुछ पैसे मिल जाया करते थे रोज की तरह 1 दिन प्रतिदिन जप कनॉट प्लेस पर बैठे हुए थे तो उनके सामने  कार कि जिस की पिछली सीट पर एक विदेशी महिला बैठी हुई थी उन्होंने प्रद्युम्न को उनका पोट्रेट बनाने के लिए कहा बिना कुछ पूछे प्रदुम ने उन्हें जल्दी से पोट्रेट बनाकर दे दिया


 उस पोस्ट को देख वह महिला इतनी इंप्रेस हो गई कि उन्होंने प्रथम से मिलने आने को कहा अगले दिन परमुद्द ने उस महिला से मिलने पहुंचे और उसको पता चला कि वह महिला कोई और नहीं बल्कि रूस की वेलेंटीना टैरेशकोवा थी। जो कि दुनिया की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री हैं। पॉपुलर रोटी की तरफ तो यह प्रतियोगिता बस पहला कदम था 1 दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सचिव महानंदिया के पास आए और उसे इंदिरा जी का प्रोटेक्ट बनाने को कहा प्रति उनके बनाए पोट्रेट खुद देख सभी इतना खुश हुए कि उसके बाद से दिल्ली सरकार का रवैया भी उनके प्रति बदल गया 


तब तक प्रद्युम्न काफी मुश्किल हालातों से गुजर रहे थे मगर फिर सरकार ने उन्हें कुछ जरूरी सुविधाएं मुहैया करवाने का फैसला लिया थोड़ी देर रात तक काम करने के लिए बंदोबस्त किया गया इसके बाद से प्रदुम भी दिन रात एक कर के मेहनत करने लगे मगर शायद उसने भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि कनॉट प्लेस के कोने में बैठे बैठे उनकी जिंदगी बदलने वाली है।


 यह किस्सा साल 1975 का है जब सैलरी भविष्य नाम की एक सीडी स्टूडेंट मशहूर हैप्पी ग्रीन को फॉलो करते हुए 22 दिन के टूर पर इंडिया आई थी जो कनॉट प्लेस घूमने के लिए गए और उसने प्रद्युम्न को देखा और उसका पोट्रेट बनाने के लिए कहा फिर वही हुआ जैसे हम सभी कहते हैं लव अट खेलकूद प्रतियोगिता नर्वस हो गए कि वह शैलेश का पोर्ट्रेट बना ही नहीं पाए और उसे कल फिर से आने को कहा तृषा ले कौन का पोस्ट बनाकर दे दिया


 लेकिन इसके बाद भी 4 दिन से लगातार मिलने आती रही और कुछ दोनों के बीच गहरी दोस्ती और फिर एक अच्छा कनेक्शन बढ़ने लगा दूसरी किसी भी लव स्टोरी में तो प्यार करने वाले कभी ना कभी मिलेंगे यह तो तय होता है। अगर वो दिन कौन होगा यह किसी को नहीं पता होता उनका केस थोड़ा अलग का दर्शन उनके पिता प्रोफेशन से पोस्ट मास्टर होने के साथ-साथ ज्योतिष की भी काफी अच्छी समझ रखते थे 


उन्होंने परमुद्द का भविष्यवाणी कर दी थी कि प्रद्युम्न की शादी दूसरे देश की किसी वृषभ राशि वाली एक निर्देशन लड़की से होगी जो एक जंगल की मालकिन भी होगी चलेट से मिलने के बाद कोई उसको अपने पिता की भविष्यवाणी याद आई और मजे की बात तो यह है कि जब उन्होंने यह बात शायद को बताई तो उन्होंने कहा कि हम एक म्यूजिक शन हूं।


 और मेरा जोडियक साइन भी तो राशि है और तो और शैलेश वाकई में एक बड़े एस्टेट की मालकिन भी थी बात करने के बाद परमुद्द को यकीन हो गया कि यही वह लड़की है जिसके साथ उनकी शादी होने वाली है।


 धीरे-धीरे दोनों में प्यार बढ़ता गया और फिर उन्होंने ट्राइबल हुई थी रिवाजों से शादी कर ली दो-तीन हफ्तों के पास वाले का वीजा खत्म होने का दिन आ गया और उन्हें स्वीडन वापस लौटना पड़ा दूसरी तरफ से परमुद्द यही रुक कर अपने काम को आगे बढ़ाने का फैसला किया करीब डेढ़ साल तक वह अपनी पत्नी से अलग रहे दौरान दोनों लेटेस्ट किस्म की बातें किया करते थे।


 और आखिरकार साल 1977 में प्रद्युम्न एशले से मिलने सूजन जाने का फैसला किया मगर उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वह हवाई जहाज का टिकट खरीद पाते ऐसे में उन्होंने अपने पास मौजूद सारा सामान बेच दिया जिससे उन्हें ₹12 मिले और फिर होती है हमारी कहानी के हीरो की एंट्री पूरी 1200 ₹100 में से ₹80 खर्च कर प्रद्युम्न एक पुरानी साइकिल खरीदी पैडल मारते हुए वह अपने 6000 किलोमीटर से भी ज्यादा लंबे सफर पर निकल पड़े।


 जी हां आपने बिल्कुल सही सुना कृतियों में भारत से यूरोप तक करीब 6000 किलोमीटर का सफर है साइकिल पर तय करने वाले थे और समान के नाम पर उनके पास साइकिल के अलावा सिर्फ एक स्लीपिंग बैग था अपने प्यार से मिलने की राह में उन्हें तरह-तरह की परेशानियां हुई और दिक्कतों का सामना करना पड़ा 


 तो वह कुछ लोगों के स्केच बनाते हैं और उसके बदले में उनसे खाना और एक रात उनके घर में रुकने की मदद मांग लिया करते कई रातें तो प्रद्युम्न ने अपने स्लीपिंग बैग में खुले आसमान के नीचे बिताएं फिर कुछ और रुपए और कुछ अच्छे लोगों की मदद से परमुद्द ईरान तुर्की अफगानिस्तान बुलगारी आज जर्मनी और ऑस्ट्रिया जैसे देशों से गुजरते हुए 5 महीनों के लंबे सफर के बाद आखिरकार स्वीडन की सीमा पर पहुंचे।


 लेकिन फिर शुरू होता है क्लाइमैक्स इमीग्रेशन विजा ना होने के कारण उनको बॉर्डर पर ही रोक दिया जाता है अपनी शादी का सर्टिफिकेट दिखाने के बाद भी स्वीडिश अवसर उन्हें अंदर नहीं जाने देते क्योंकि उन्हें इस बात पर यकीन नहीं हो रहा था कि साइकिल के जरिए कोई इंसान भारत से वहां कैसे पहुंच सकता है और ऐसे इंसान की शादी स्वीडन की एक अमीर लड़की से कैसे हो सकती है शादी की तस्वीरों को देखने के बाद अफसरों ने शारलेट से संपर्क किया और कन्फर्मेशन के बाद ही प्रद्युम्न को स्वीटी सीमा में दाखिल होने की इजाजत दी गई 


अपने पति के सूजन पहुंचने की बात को सुनकर शायद खुद प्रद्युम्न को गोदनवा बॉर्डर पर रिसीव करने आए आपको बता दें कि स्वीडन पहुंचने से पहले तक पर जून को इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि उनकी शादी स्वीडन की एक रॉयल फैमिली से ताल्लुक रखने वाली लड़की से हुई है शरीर के साथ जाने के बाद उनके मन में कई सवाल खड़े हो रहे थे लेकिन पत्नी से मुलाकात के बाद सब कुछ ठीक हो गया फिर दोनों ने साल 1979 में स्वीडिश कानून के हिसाब से दोबारा शादी किया लेकिन हालत उनके लिए यूरोपियन कल्चर और लाइफस्टाइल बिल्कुल अलग था ।


लेकिन उनकी से समझने और इसमें गले में पूरी मदद की दोस्तों आपको जानकर खुशी होगी कि आज इन दोनों की शादी को 40 साल से भी ज्यादा का समय हो चुका है और इनके दो बच्चे भी हैं अब प्रदुम सूजन के नागरिक हैं और वहां सुरेश सरकार के कला और संस्कृति विभाग के सलाहकार के रूप में काम करते हैं दुनिया भर में उनकी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगती रहती है।


 साथ ही प्रेस्टीजियस यूनिसेफ ग्रीटिंग कार्ड्स में भी उनकी पेंटिंग को जगह मिल चुकी है दोनों पति-पत्नी उड़ीसा आते रहते हैं और अपने गांव वालों से मिलते जुलते रहते हैं।


 4 जनवरी 2012 को उन्हें उड़ीसा के भुवनेश्वर में उत्कल यूनिवर्सिटी ऑफ कल्चर के द्वारा ऑन रही डॉक्टर डिग्री से भी सम्मानित किया गया इसके अलावा उन्हें उड़ीसा सरकार द्वारा संविधान में उड़िया कल्चरल के रूप में भी चुना गया उनकी यह कहानी इतनी खास है किस पर किताब तो पहले ही लिखी जा चुकी है वहीं आप बहुत से फिल्म डायरेक्टर्स इस पर फिल्म बनाने की प्लानिंग भी कर रहे हैं इस कहानी को तसल्ली से जाने के लिए आप भी पेंशन की किताब द अमेजिंग स्टोरी ऑफ द मैन फ्रॉम इंडिया टू यूरोप पढ़ सकते है।


 तो हमारे लिए इस कहानी का हीरो सेकंड हैंड साइकिल है क्योंकि उसने प्रद्युम्न का साथ ना दिया होता तो शायद यह लव स्टोरी भी अधूरी रह गई होती तो हमारी बात अब आप कमेंट के दरिया में बताइए कि इस कमाल की लव स्टोरी का कौन सा पाठ आपको पसंद आया 


तो दोस्तो हम फिर मिलेंगे नई पोस्ट के साथ तब तक के लिए जय हिंद जय भारत

No comments:
Write comment