Sunday, October 23, 2022

पृथ्वी का वातावरण नष्ट क्यों हो रहा है?

 पृथ्वी का वातावरण नष्ट क्यों हो रहा है?

तो आज पूरे विश्व के सामने एक खतरा मुंह फाड़ के खड़ा है, और वह है जलवायु में आता तेजी से परिवर्तन अभी तक वैज्ञानिकों द्वारा जारी किए गए आंकड़े हमें बताते हैं। कि हर नए साल के साथ पृथ्वी का औसतन तापमान बीते साल की तुलना में अधिक हो जाता है।

पृथ्वी का वातावरण नष्ट क्यों हो रहा है?
विश्व के जंगल मे आग लगी है।

 आज विश्व भर के जंगलों में आग शांत होने का नाम नहीं ले रही है। वहीं तटीय इलाकों में एक के बाद एक भयानक तूफान आ रहे हैं। दुबई जैसे गर्म महानगरों में भी सर्व तूफान आ जाते हैं। साथ ही करोड़ों वर्षों से जमे बर्फ के पहाड़ लगातार पिघल रहे हैं। पिछले कई दशकों से हो रहे इस जलवायु परिवर्तन का कारण सिर्फ ग्रीन हाउस गैसें ही है।


ग्रीन हाउस गैस क्या है।

 यह कैसे पृथ्वी पर औद्योगिक क्रांति के बाद शुरू हुई थी और अब लगातार बढ़ रहे हैं हैरानी की बात यह है कि आज भी हम इंसान ग्रीन हाउस गैसों को कम करने के बारे में गंभीरता से नहीं सोच रहे हैं। सन 2000 से लेकर आज तक पूरे विश्व में कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में 50% की बढ़ोतरी हो चुकी है।


 और यह बढ़ोतरी हर बीते वर्ष के साथ और अधिक हो जाती है। अब सवाल उठता है। कि ग्रीन हाउस गैसों के हानिकारक प्रभाव लिखने के बावजूद ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा में लगातार बढ़ोतरी क्यों हो रही है। इसका कारण क्या है कि कितनी टेक्नोलॉजी होने के बावजूद भी हम यह सब नहीं रोक पा रहे हैं?


 चलिए आज के पोस्ट में इसी बारे में जानते हैं दोस्तों पूरी पिक्चर पर होने वाली कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को हम तीन तत्वों द्वारा समझ सकते हैं जनसंख्या का आकार विश्व द्वारा की गई आर्थिक तरक्की और ऊर्जा के प्रयोग का तरीका पर हम जनसंख्या के आकार की बात करें तो हम समझ सकते हैं।


मनुष्य के क्या -क्या चीजे जरूरी है।

 कि एक जमाने में मनुष्यों की पहली आवश्यकता सिर्फ रोटी कपड़ा और मकान तक ही सीमित हुआ करती थी परंतु आज हमें 50000 से ₹100000 तक का स्मार्टफोन और खाने के लिए मैकडॉनल्ड्स का बर्गर भी चाहिए जितनी ज्यादा जनसंख्या होगी ऐसी वस्तुओं की मांग भी उतनी ही अधिक होगी अधिक मांग को पूरा करने के लिए इन उत्पादों का निर्माण भी फैक्ट्रियों में बड़े पैमाने पर किया जाएगा इसका नतीजा कार्बन डाइऑक्साइड के अधिक उत्सर्जन के रूप में ही होगा 


विश्व मे कितने जनशंख्या होंगी

क्लिक कई दशकों से विश्व की जनसंख्या बड़ी तेजी से बढ़ रही है यूएन की रिपोर्ट के अनुसार 21वी सदी बीतने के साथ ही पूरे विश्व की जनसंख्या 760 करोड़ से बढ़कर 11 100 करोड़ तक हो जाएगी यानी की जनसंख्या में 40% की बढ़ोतरी हो चुकी होगी भविष्य में तकनीकी भी और ज्यादा विकसित होंगी 


ताकि एक बड़ी जनसंख्या के लिए अत्यधिक बड़े पैमाने पर उत्पादन भी किया जा सके अधिक ऊर्जा और अधिक संसाधनों की खपत के कारण प्रदूषण और ग्रीन हाउस गैसों में भी अधिकता आने निश्चित ही है जनसंख्या की बढ़ोतरी को रोकने के लिए हमें विकासशील देशों और गरीब तबके के लोगों को शिक्षित करना पड़ेगा की सबसे अधिक जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों में ही बढ़ रही है जाहिर है। बढ़ती जनसंख्या पर रोक लगाने की बेहद ही कठिन कार्य है और जब तक यह कठिन कार्य नहीं सब जाता तब तक पर्यावरण को स्वच्छ करने के बारे में भी सोचना दूर की कौड़ी है।


आथिर्क तार्किक क्या होता है।

 आर्थिक तरक्की दोस्तों सामान्य शब्दों में आर्थिक धरती का मतलब है। और ज्यादा अमीर बनते जाना और इतने ज्यादा हम अमीर बनेंगे हमारे रहन-सहन के तरीकों में भी बदलाव होने लगेगा हम एसी फ्रिज टीवी कार जैसे उत्पाद खरीदेंगे जिससे प्रदूषण और बिजली की खपत बढ़ेगी


उदहारण के लिए

 उदाहरण के लिए अमेरिका में रहने वाले काम नौकरी पैसे वाला नागरिक अपने रहन-सहन के कारण ही गरीब अफ्रीकी देश में रहने वाले 50 किसानों के बराबर प्रदूषण फैलाता है। बुकिंग इन गरीब किसानों के पास नदुआ छोड़ने वाली कारें हैं।


कारखानों में बिजली की आवश्कता जरूर पड़ती है।

 और ना ही इन्हें जहर उगलते कोयले के कारखानों में बनती बिजली की ही अधिक आवश्यकता पड़ती है मतलब साफ है। कि किसी भी सभ्यता की जितनी ज्यादा तरक्की होगी उतना ही ज्यादा वह सभ्यता प्रदूषण भी फैल आएगी और आज पूरे विश्व में आर्थिक विकास के की लहर दौड़ रही है तेजी से लोगों का रहन सहन का ढंग बदल रहा है।


पूरे विश्व से गरीबी खत्म करना चाह रहा है।

 पूरे विश्व से ही गरीबी खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है काशील देश विकसित देश बनना चाहते हैं। और गरीब देश विकासशील देशों की श्रेणी में आना चाहते हैं। आने वाले समय में सभी देश तरक्की करेंगे हर देश के लोग अमीर बनेंगे वहां के निवासियों के जीवन का स्तर सुधरेगा जिस कारण कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में बढ़ोतरी होती ही रहेगी ऊर्जा के प्रयोग का तरीका दोस्तों हम जानते हैं।


 कि जनसंख्या में बढ़ोतरी और आर्थिक स्थिति में आया सुधार ही अधिक प्रदूषण और ग्रीन हाउस गैसों में बढ़ोतरी करता है और ना ही विश्व की जनसंख्या में होती वृद्धि होती दिखाई दे रही है। और ना ही कोई देश खुद के आर्थिक हालात खराब करके गरीब होना चाहेगा प्ले अभी जो पूरे विश्व में चल रहा है उसे देखते हुए कहा जा सकता है। कि वर्तमान में ग्रीनहाउस गैसों या प्रदूषण पर लगाम कसना मुमकिन ही नहीं दिखाई पड़ता है।


खाना बनाने के लिए हमारे देश मे

 किंतु हमारा बढ़ता तकनीकी ज्ञान आने वाले भविष्य में शायद हमारी कुछ मदद कर पाए खुदा उनके लिए हमारे भारत में अभी भी खाना पकाने के लिए कोयले या लकड़ी का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।


यूरोप देश मे खाना कैसे पकाया जाता है।

 अगर हमें कि यूरोप के विकसित देश की बात करें तो वहां इंडक्शन चूल्हे पर खाना पकाया जाता है। और वह इंडक्शन चूल्हा न्यूक्लियर पावर प्लांट से पैदा की गई बिजली से चलता है। न्यूक्लियर पावर प्लांट द्वारा बिजली उत्पादित करते समय काफी कम मात्रा में ही ग्रीनहाउस गैस उत्पन्न होती है।


 हम सही तरीके से ऊर्जा के संसाधनों का इस्तेमाल करके ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में रोकथाम कर सकते हैं। कुछ वर्ष पहले तक हम रोशनी के लिए बल्ब का इस्तेमाल करते थे बलम आमतौर पर 100 वाट की बिजली खपत करते हुए जलता था फिर हमने उस पल को 20 वाट के सीएफएल से बदला और आज सिर्फ पांच से 7 वाट की एलइडी से ही हमें अच्छी खासी रोशनी प्राप्त हो जाती है। एनी विज्ञान की बढ़ती तकनीकों की मदद से हमारी रोशनी की खबर सोमवार से 5 वाट पर आ गई है कल अब यही हुआ कि आने वाले भविष्य में अगर हम प्रौद्योगिकी को और भी अच्छे तरीके से प्रयोग में लाए तो और ज्यादा ऊर्जा यानी बिजली बचा सकते हैं।


मोबाइल से बिजली बच्चा सकते है।

 जिससे कार्बन डाइऑक्साइड गैस के उत्सर्जन में भी भारी कमी आएगी आने वाले भविष्य में बिजली बचाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रयोग करने की कोशिश भी की जा रही हैं

 इसे अलग कमरे में कोई नहीं होगा तो लाइटे खुद-ब-खुद बंद हो जाएगी या आप घर से बाहर बैठे भी फोन के जरिए अपने घर की सभी इलेक्ट्रिक वस्तु को बंद कर सकते हैं।


 हमें कोयले से चलने वाली फैक्ट्रियों को सोलर प्लांट पवनचक्की हो या परमाणु ऊर्जा से चलाने की और भी अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। आती हमें ट्रांसपोर्टेशन सिस्टम को भी पूरी तरह से पेट्रोल-डीजल से मुक्त करके सीएनजी या इलेक्ट्रिकल पर लाना होगा जिसे धुआं उगलते वाहनों से मुक्ति मिल सके वैसे अगर देखा जाए तो इन सब तकनीकों का इस्तेमाल करने से भी कई बार नई समस्याएं उत्पन्न हो जाती है।


 जैसे ही हम किसी संसाधन को और भी ज्यादा कुशलता से इस्तेमाल करना शुरू कर देते हैं। वैसे ही उस संसाधन का इस्तेमाल भी बढ़ा देते हैं। खुद आन के लिए जब कम ईंधन पर चलने वाले हवाई जहाज बनने लगे तो टिकटों की कीमत भी कम होने लगी जिसका नतीजा यह हुआ कि यात्रियों की संख्या में भी बेहिसाब बढ़ोतरी होने लगी और आज ओके उड़ने के घंटे भी पहले की तुलना में ज्यादा होने लगे ठीक है।


सीएनजी कार वाले क्या करते है।

 ऐसे ही हम देख रहे हैं कि जिनके पास सीएनजी वाली कार है। वह प्रति किलोमीटर खर्च कम आने के कारण बिना किसी वजह के भी अपने कार्य को रोड पर दौड़ आते रहते हैं यानी एक तरफ अगर हम ऊर्जा के संसाधनों का बेहतर तरीके से इस्तेमाल सीखते हैं।


 ताकि लागत और प्रदूषण कम हो तो वहीं दूसरी तरफ इस्तेमाल भी ज्यादा करने लगते हैं। जिस कांड कार्बन डाइऑक्साइड गैस का उत्सर्जन फिर से पहले जितना ही हो जाता है। वैसे अब वैज्ञानिक ऐसी मशीनें बनाने की कोशिश भी कर रहे हैं। जिनमें वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड गैस या प्रदूषण को खींचने की क्षमता होगी इंजंत्रों को बड़े-बड़े शहरों में लगाया जाएगा जिससे ग्रीन हाउस गैसों से छुटकारा मिल सके परंतु ऐसी उन्नत तकनीकों को आने में अभी काफी लंबा वक्त लग सकता है।


 और वक्त तो हमारे पास बिल्कुल भी नहीं है हर साल कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा वातावरण में तेजी से बढ़ रही है और जब तक हम कोई नई तकनीक ना खोज ले तब तक हमें कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को ही कम करना होगा नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब हम मनुष्य द्वारा फैलाया हुआ प्रदूषण ग्रीनहाउस गैस से समस्त पृथ्वी के हरे भरे वातावरण को बर्बाद कर देगी पोस्ट को आखिरी तक पूरा देखने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद

No comments:
Write comment